रायपुर आए लगभग एक महीना हो गया...जबसे यहां आई हूं कुछ ख़ास पढ़-लिख नहीं सकी....सौभाग्य से पिछले हफ्ते...अमृत लाल नागर की एक अप्रकाशित कहानी...मछली पढ़ने का मौका मिला...सच एक छोटी सी कहानी ने जैसे लंबे समय की थकान मिटा दी....कहानी बहुत सीधी और सरल थी...फिर भी कहीं गहरे पैठ कर गयी...दरअसल सीधी बात समझना बहुत मुश्किल होता है...क्योंकि ये हमें बहाने बनाने और टालने का मौका नहीं देती.....ख़ास बात..इसके साथ चलना बहुत मुश्किल होता है....खैर...अब बात कहानी की....नागर जी की रचनाओं का यूं तो एक समृद्ध इतिहास रहा है...ऐसे में मछली को अद्वितीय रचना कह देना भी रचनाकर के अन्य रचनाओं के साथ न्याय न होगा.....इन सबके बावजूद मछली दो मायनों में ख़ास है....पहली गज़ब की संघर्षशीलता को सरलतम शब्दों में प्रस्तुत करने की दृष्टि से....दूसरी गद्य के भीतर से झांकते पद्य दर्शन की दृष्टि से...कहानी का सार सीधा सा है...एक छोटी सी मछली सूरज को छूने की इच्छा जाहिर करती है...सब के मना करने के बावजूद... क्षितिज को अपना आखिरी पड़ाव मानकर लगातार विपरीत परिस्थितियों में सफर करती है...आखिरकार थक कर बेहोश हो जाती है...लेकिन हार नहीं मानती....उसके इस अंत पर सब उसका उपहास करते है....लेकिन आखिरकार वरूण देव प्रकट होते है... उसे अपने हाथों में उठाकर उसके कृत्व की सराहना करते है...मछलियों को हमेशा के लिए ये वरदान देते है कि... हर मछली अब धारा के विपरीत ही तैरेगी...औऱ उस नन्ही मछली की प्रजाति की मछलियां अब हमेशा सूरज को अपने पंखों पर लेकर घूमेगीं...यानि उनके पंख इतने उजले होगे कि अंधेरें रास्तों में भी चमकेगें...ख़ुद तो रौशन होगे ही साथ ही औरों को भी रोशनी देगें...यूं तो वो मछली मारी गयी लेकिन बड़ी बात ये है कि अपने पीछे वो एक इतिहास छोड़ गयी...जो यहां लिखने लायक है...जो सीखने लायक है..जो स्फूर्ति भर देने लायक है....और उससे भी बढ़कर...मछली ने अपने जीवन में वो किया जो उसने चाहा...अंजाम जो भी रहा हो...पर कम से कम रास्ता तो मकसद के साथ तय किया गया...अंत भी तमाम छोटी मछलियों को रौशनी दे गया....और धारा के विपरीत तैरने का हुनर भी....वो मछली महान है...उसका जीवन महान है...उसका कृत्व सम्मान के लायक है....सवाल ये है कि...ये सीधी कहानी हमारी जिंदगी से मेल क्यों नहीं खाती...क्या हम मछली से भी छोटे है....या हमारे हौसले पस्त है....दरअसल ये सवाल हर शख्स का खुद से होना चाहिए कि वो अपने आप से क्या चाहता है...समझौतों, बेईमानी भरी परतंत्र खोखली जिंदगी....या एक मकसद के लिए चुना गया रास्ता...जो भले ही मुश्किल हो...लेकिन हमारे अंदर के आत्म सम्मान को पैदा होने से पहले ही उसका गला तो न घोटे..जो विरोध करना सीखे...जो लड़ना सीखे...ठुकराना सीखे..ना कहना सीखे...और जिंदगी की इज्जत करना सीखे...न कि इस समझौतावादी बाजार में हर दिन खुद को नीलाम करे...क्योकि सवाल अब भी वहीं है...मछली की कहानी हम सब की कहानी से मेल क्यूं नहीं खाती....
अपर्णा...(11:36 P.M)
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गद्य के भीतर से झांकते पद्य दर्शन की दृष्टि से-बात गहरे उतर गई कहीं!!
ReplyDelete-जबरदस्त!!