Friday, August 7, 2009

कायल हूं उस विरोध की...

मर्डर के केस में अंदर हूं...12 साल से सज़ा काट रही हूं ...पति बुरा आदमी था... मार डाला...अफसोस नहीं...सड़-सड़ कर मरने से तो ये जिंदगी बेहतर है...ये जवाब है अपने पति के क़त्ल के इल्ज़ाम में सजा काट रही ईश्वरी के....और ये जवाब देते हुए उस महिला कैदी के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं...बल्कि गजब का आत्मविशवास है...वहीं जो हारी हुई बाज़ी जीत लेने के बाद आ जाता है...वहीं जो हमें अपनी ही नज़रों में ऊपर उठा जाता है...दरअसल यहां आत्मविशवास को उसके गुनाह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जा सकता...ये आत्मविशवास एक स्वतंत्र स्त्री का है जो आज सलाखों के पीछे भी खुद को आजाद पाती है...मुद्दा ये नहीं कि उसने सहीं किया या गलत...मुद्दा ये है कि उसने परतन्त्रता की जिंदगी नहीं स्वीकारी...उसके जितनी शिक्षा....और आस-पास के माहौल में यकीनन कोई नारीवाद की बाते तो नहीं ही कर सकता...लेकिन ये आधी दुनिया की उन चुनिंदा स्त्रियों में से एक है...जिसकी नसों में विरोध दौड़ता है...जो इतनी लंबी सजा काट लेने के बावजूद भी आत्मविश्वास से भरपूर है....एक बार फिर लिख देना चाहती हूं कि मुद्दा ये नहीं कि उसने सही किया ये गलत...मुद्दा ये है कि कुछ तो किया...विरोध तो दर्ज कराया...तकलीफों भरी जिंदगी की कसक उन नज़रों से आंसू बनकर झलक आयी...फिर भी उन निगाहों को एक पल के लिए भी शर्मिंदगी ने नहीं ढ़का...वो तकलीफ का आसूं बरोनियों से तो ढ़लका पर अन्तस के आत्मविश्वास ने उसे गालों पर रोक दिया...मैं उस गुनाह की पैरोकार नहीं जो उस ईश्वरी से हुआ...पर उस विरोध की क़ायल हो गयी...जो उन आंखों में तैर रहा था...विरोध दम घोटू जिंदगी का..विरोध पुरूष के अत्याचार का...विरोध नारी को नारी बना देने के व्यवहार का...विरोध उस परिवार का उस परिवेश का जिसने उसे कभी उसकी शर्तों पर जीने न दिया... वो विरोध उन आंखों से निकला औऱ मेरे ज़हन में समा गया...मैं हिंसा की विरोधी हूं...इसलिए किसी हाथ में कटार नहीं पर नज़र में वों विरोध देखना चाहती...सच मैं कायल हूं उस विरोध की...
(रक्षाबंधन के दिन मैं महिला जेल गई थी....भाईयों का इंतजार करती महिला कैदियों से मिलने..दरअसल वज़ह मेरी ख़बर थी...वहीं इस महिला कैदी ईश्वरी से मुलाकात हुई...अभी तक भूल नहीं पाई और शायद कभी वो नज़र नहीं भूल पाऊगी)
अपर्णा(10:58)

Monday, August 3, 2009

शोला हूं भड़कने की गुज़ारिश नहीं करता.....

...गिरती हुई दीवार का हमदर्द हूं लेकिन चढ़ते हुए सूरज की परशतिश नहीं करता....शोला हूं भड़कने की गुजारिश नहीं करता....जगजीत सिंह की गज़ल की ये चंद लाइने गाहे-बगाहे मेरे जेहन आ ही जाती है...हालांकि ये गज़ल सुने भी जमाना हो गया....फिर भी दिन में कई बार ये लाइने जाप की तरह जप ही लेती हूं...मिसाल के तौर पर जब किसी सूट-बूट धारी को नाक सिकोड़ते फुटपात के किनारे से गुजरता देखती हूं...किसी रेस्टोरेन्ट में साहब को वेटर को सुन या अबे कहते हुए सुनती हूं... या किसी मैडम को नखरे दिखाते भौहें सिकोड़ते उस गली से गुजरते देखती हूं...जहां बचपन में वो खेला करती थी...जब पापा कलेक्टर नहीं हुए थे...या फिर उस अतिथि को जो काला चश्मा पहन कर एनजीओ में सेवा करने आता है...दो तीन फोटो खिंचवाता है और कैमरा हटते ही उसकी समाज सेवा वहीं आखिरी सांस ले लेती है....इन सारी जगहों पर मेरा रोआ-रोआ कांप जाता है...एक विशाद है जो मुझे घेर लेता है एक तड़प जो दम घोटू है...ऐसे किसी भी साहब या मैडम की मै परशतिश नहीं करती...मेरी नज़र में वो इंसान बड़ा है...जो सामने वाले को सिर्फ इसलिए इज्जत देता है क्योकि वो भी एक इंसान है...किसी साहब या मैडम की सूट-बूट, पैसे या खूबसूरती से मुझे समस्या नहीं...मेरा विरोध उस अभिमान से है..जो उसे झूठा बनाता है..असमानता सिखाता है...भेदभाव बढ़ाता है...सच मुंह से निकल जाता है कोशिश नहीं करता....शोला हूं...

अपर्णा (11:04)

ये कहानी, कहानी क्यूं है.....

रायपुर आए लगभग एक महीना हो गया...जबसे यहां आई हूं कुछ ख़ास पढ़-लिख नहीं सकी....सौभाग्य से पिछले हफ्ते...अमृत लाल नागर की एक अप्रकाशित कहानी...मछली पढ़ने का मौका मिला...सच एक छोटी सी कहानी ने जैसे लंबे समय की थकान मिटा दी....कहानी बहुत सीधी और सरल थी...फिर भी कहीं गहरे पैठ कर गयी...दरअसल सीधी बात समझना बहुत मुश्किल होता है...क्योंकि ये हमें बहाने बनाने और टालने का मौका नहीं देती.....ख़ास बात..इसके साथ चलना बहुत मुश्किल होता है....खैर...अब बात कहानी की....नागर जी की रचनाओं का यूं तो एक समृद्ध इतिहास रहा है...ऐसे में मछली को अद्वितीय रचना कह देना भी रचनाकर के अन्य रचनाओं के साथ न्याय न होगा.....इन सबके बावजूद मछली दो मायनों में ख़ास है....पहली गज़ब की संघर्षशीलता को सरलतम शब्दों में प्रस्तुत करने की दृष्टि से....दूसरी गद्य के भीतर से झांकते पद्य दर्शन की दृष्टि से...कहानी का सार सीधा सा है...एक छोटी सी मछली सूरज को छूने की इच्छा जाहिर करती है...सब के मना करने के बावजूद... क्षितिज को अपना आखिरी पड़ाव मानकर लगातार विपरीत परिस्थितियों में सफर करती है...आखिरकार थक कर बेहोश हो जाती है...लेकिन हार नहीं मानती....उसके इस अंत पर सब उसका उपहास करते है....लेकिन आखिरकार वरूण देव प्रकट होते है... उसे अपने हाथों में उठाकर उसके कृत्व की सराहना करते है...मछलियों को हमेशा के लिए ये वरदान देते है कि... हर मछली अब धारा के विपरीत ही तैरेगी...औऱ उस नन्ही मछली की प्रजाति की मछलियां अब हमेशा सूरज को अपने पंखों पर लेकर घूमेगीं...यानि उनके पंख इतने उजले होगे कि अंधेरें रास्तों में भी चमकेगें...ख़ुद तो रौशन होगे ही साथ ही औरों को भी रोशनी देगें...यूं तो वो मछली मारी गयी लेकिन बड़ी बात ये है कि अपने पीछे वो एक इतिहास छोड़ गयी...जो यहां लिखने लायक है...जो सीखने लायक है..जो स्फूर्ति भर देने लायक है....और उससे भी बढ़कर...मछली ने अपने जीवन में वो किया जो उसने चाहा...अंजाम जो भी रहा हो...पर कम से कम रास्ता तो मकसद के साथ तय किया गया...अंत भी तमाम छोटी मछलियों को रौशनी दे गया....और धारा के विपरीत तैरने का हुनर भी....वो मछली महान है...उसका जीवन महान है...उसका कृत्व सम्मान के लायक है....सवाल ये है कि...ये सीधी कहानी हमारी जिंदगी से मेल क्यों नहीं खाती...क्या हम मछली से भी छोटे है....या हमारे हौसले पस्त है....दरअसल ये सवाल हर शख्स का खुद से होना चाहिए कि वो अपने आप से क्या चाहता है...समझौतों, बेईमानी भरी परतंत्र खोखली जिंदगी....या एक मकसद के लिए चुना गया रास्ता...जो भले ही मुश्किल हो...लेकिन हमारे अंदर के आत्म सम्मान को पैदा होने से पहले ही उसका गला तो न घोटे..जो विरोध करना सीखे...जो लड़ना सीखे...ठुकराना सीखे..ना कहना सीखे...और जिंदगी की इज्जत करना सीखे...न कि इस समझौतावादी बाजार में हर दिन खुद को नीलाम करे...क्योकि सवाल अब भी वहीं है...मछली की कहानी हम सब की कहानी से मेल क्यूं नहीं खाती....

अपर्णा...(11:36 P.M)

Monday, March 16, 2009

कोई यहाँ आया था

कल कोई यहाँ आया था

बीती रात किसी ने मेरा दरवाजा खटखटाया था

कोई मुसाफिर रास्ता भूल गया था शायद

इतना निंदासा था की चोखट पर ही ढेर हो गयामंजिल भूल कर रस्ते पर ही सो गया

यही दरवाजे पर बैठी हु सुबह उठते ही रास्ता पूछेगा

मै न मिली तो बीती रात ओर मुझे दोनों को कोसेगा
कल कोई यहाँ आया था

मै ही स्वतंत्रता हू

हा मै ही स्वतंत्रता हूँ
ओर वो जो बेधड़क मेरी नसों से गुजर गया वो विरोध मेरा प्रेमी है
मुझे लाज नही आती कहने में, लगभग हर रात हमबिस्तर रही हूँ उसके, ओर उन्ही अधजगी खूबसूरत रातो का परिणाम है वो मेरा जिगर का टुकडा विचलन
वो अभी छोटा है
बोल नही पाता रोता है चिलाता है ओर ऐसे ही अपनी व्यथा बता है
उसकी ये व्यथा कोई समझ नही पता लेकिन मै सब समझती हूँ आखिर माँ हूँ
वो अभी संघर्ष नही खा पाता इसलिए स्तनपान कराती हूँ केवल विचार ही पिलाती हू
वो बड़ा होकर परिवर्तन बनेगा
हमारा नाम रोशन करेगा
न उसे गाली मत देना वो मेरी नाजायज़ ओलाद नही प्रेम साधना है
विरोध ने उसे अभी नाकारा नही है वो मेरा बच्चा है आवारा नही है
उसे अनाथ भी मत कहना क्योकि मै अभी जिन्दा हूँ
ओर मै बता दू की अपने इस कृत्य पर मै शर्मिंदा नही हूँ