मर्डर के केस में अंदर हूं...12 साल से सज़ा काट रही हूं ...पति बुरा आदमी था... मार डाला...अफसोस नहीं...सड़-सड़ कर मरने से तो ये जिंदगी बेहतर है...ये जवाब है अपने पति के क़त्ल के इल्ज़ाम में सजा काट रही ईश्वरी के....और ये जवाब देते हुए उस महिला कैदी के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं...बल्कि गजब का आत्मविशवास है...वहीं जो हारी हुई बाज़ी जीत लेने के बाद आ जाता है...वहीं जो हमें अपनी ही नज़रों में ऊपर उठा जाता है...दरअसल यहां आत्मविशवास को उसके गुनाह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जा सकता...ये आत्मविशवास एक स्वतंत्र स्त्री का है जो आज सलाखों के पीछे भी खुद को आजाद पाती है...मुद्दा ये नहीं कि उसने सहीं किया या गलत...मुद्दा ये है कि उसने परतन्त्रता की जिंदगी नहीं स्वीकारी...उसके जितनी शिक्षा....और आस-पास के माहौल में यकीनन कोई नारीवाद की बाते तो नहीं ही कर सकता...लेकिन ये आधी दुनिया की उन चुनिंदा स्त्रियों में से एक है...जिसकी नसों में विरोध दौड़ता है...जो इतनी लंबी सजा काट लेने के बावजूद भी आत्मविश्वास से भरपूर है....एक बार फिर लिख देना चाहती हूं कि मुद्दा ये नहीं कि उसने सही किया ये गलत...मुद्दा ये है कि कुछ तो किया...विरोध तो दर्ज कराया...तकलीफों भरी जिंदगी की कसक उन नज़रों से आंसू बनकर झलक आयी...फिर भी उन निगाहों को एक पल के लिए भी शर्मिंदगी ने नहीं ढ़का...वो तकलीफ का आसूं बरोनियों से तो ढ़लका पर अन्तस के आत्मविश्वास ने उसे गालों पर रोक दिया...मैं उस गुनाह की पैरोकार नहीं जो उस ईश्वरी से हुआ...पर उस विरोध की क़ायल हो गयी...जो उन आंखों में तैर रहा था...विरोध दम घोटू जिंदगी का..विरोध पुरूष के अत्याचार का...विरोध नारी को नारी बना देने के व्यवहार का...विरोध उस परिवार का उस परिवेश का जिसने उसे कभी उसकी शर्तों पर जीने न दिया... वो विरोध उन आंखों से निकला औऱ मेरे ज़हन में समा गया...मैं हिंसा की विरोधी हूं...इसलिए किसी हाथ में कटार नहीं पर नज़र में वों विरोध देखना चाहती...सच मैं कायल हूं उस विरोध की...
(रक्षाबंधन के दिन मैं महिला जेल गई थी....भाईयों का इंतजार करती महिला कैदियों से मिलने..दरअसल वज़ह मेरी ख़बर थी...वहीं इस महिला कैदी ईश्वरी से मुलाकात हुई...अभी तक भूल नहीं पाई और शायद कभी वो नज़र नहीं भूल पाऊगी)
अपर्णा(10:58)
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

bahut khoob !
ReplyDeleteaapki lekhni me badi urjaa hai..
bani rahe...
badhaai !
पढ़ा आपका संस्मरण. क्या कहा जाये!! यह भी एक तरीका..
ReplyDeleteइसे आत्म विश्वास कहा जाय या और कुछ? पता नहीं। फिर भी आपने इसे सकारात्मक होकर तो देखा।
ReplyDeleteसादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
बेहतरीन संस्मरण
ReplyDeleteअच्छी पोस्ट।
ReplyDeletewah kya line lekhi jinke naso me verodh daudta hai.....bahut sundar
ReplyDelete